शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

Shri Lalit Bihari


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शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

अहेतुकी कृपा वृष्टि

हमारे  गुरुदेव  श्री  गंगाधर प्रकाश अहेतुकी  कृपा  वृष्टि  करने  वाले  गुरुओं  की  श्रेणी  में उनकी सहजता व सरलता के कारण अद्वितीय हैं . शक्तिपाताचार्य  गुरुदेव  को  शत्  शत्  नमन ...
     महाराजश्री अपने गुरु देव श्री विष्णु तीर्थ जी के साथ देवास के नारायण कुटी आश्रम में ध्यानस्थ थे. बाहर कोई गुरुदेव को पुकार रहा था. उस समय परम् पूज्य श्री विष्णु तीर्थ जी महाराज एवं गुरुदेव श्री गंगाधर प्रकाश के अतिरिक्त अन्य कोई भी सेवक या साधक कुटी में निवास नहीं करता था.पर्याप्त काल तक पुकारे जाने के फलस्वरूप समाधिष्ठ गुरु देव अपनी स्वरुप-में-स्थिति से निष्क्रमण कर सहसैव चेतना के किंचित निम्नस्तर पर आ गए;



     अपने चिंतन के स्तर के विषय में कुछ विचार कर पाते कि उन्हें पुनः किसी आगंतुक की पुकार सुनायी पडी, वे तत्काल अपने आसन से उठकर बाहर आगये. आगंतुक उनसे कुछ कहे बिना ही चरणों में गिरकर प्रणाम  करने लगा. ब्रह्मचारीजी श्री गंगाधर प्रकाश ने उसे किंचित स्पर्श कर नारायण-नारायण कह आशीष दिया. बस, आगंतुक को, तत्काल शक्ति के उद्वेग हो जाने के फलस्वरूप विभिन्न क्रियाएं घटित होने लगीं..
     बाहर उन क्रियायों की ध्वनि से प्रभावित हो महाराज श्री विष्णु तीर्थ जी भी बाहर आगये. पूछने पर कि क्या हुआ, ब्रह्चारी जी ने कहा स्वामी जी यह कोई आपका परिचित होगा; इसने मुझे प्रणाम किया; मेरे किंचित स्पर्श एवं उसके अभिवादन के प्रत्याभिवादन के फलस्वरूप इस पर तीव्र शक्तिपात हो गया; अब आप देखें इसका क्या करना है. स्वामी जी बोले नहीं अब यह तुम्हारा अनुग्रह प्राप्त कर चुका है इसको अब तुम्ही उचित रूप से मार्ग दर्शन देना. संतों की कृपा कब किसे बिना किसी हेतु के प्राप्त हो जाए कहा नहीं जा सकता.
ॐ आनंदं

सोमवार, 16 नवंबर 2009

GURU DEO GANGADHAR PRAKASH OF MAHAYOG PARAMPARA:


  siddha guru -
an ardent disciple 
of
SHRI VISHNU TIRTH JI MAHARAJ;

शनिवार, 14 नवंबर 2009

MERE GURUBHAI

आदरणीय ललित बिहारी श्रीवास्तव 
  • मेरे गुरु भाई ही नहीं वरन  मेरे पथ प्रदर्शक भी हैं. गुरुदेव  से प्राप्त शक्तिपात के अधिकार के फलस्वरूप न किसी प्रकार की आत्म-प्रशंसा और  न ही गर्व का लेश मात्र भी उन्हें छू सका है. एक सामान्य व्यक्ति के समान रहना, उठना-बैठना, बात व्यौहार उनकी आतंरिक सिन्धु सी साधना की  गंभीरता को किसी प्रकार से भी व्यक्त नहीं होनी देता. इसीलिये किसी परिचित व्यक्ति से भी उनके गुणों का वर्णन श्रोता को विस्मित कर देता है. वेश भूषा आधुनिक होने से आडम्बर रहित जीवन शैली होने से अमुमुक्षों की भीड़ से अपने आप को बचाए रखते हैं. सिद्धावस्था-प्राप्त मेरे गुरुभाई  किसी भी लौकिक मान्यता के मुखापेक्षी नहीं हैं. उनके शिष्य भी उनसे सामान्य रूप से ही मिलते हैं और वे भी उनसे सामान्य बर्ताव की ही अपेक्षा रखते हैं.
ज्ञान, भक्ति, शास्त्र-ज्ञान, रामायण, गीता एवं और न जाने कितने शास्त्रों पर स्वानुभूति परक उनके विचार रचयिता की सोच के पीछे रचयिता की अनुभूतियों में उनकी पैठ को दर्शाते हैं.
  • तुलसीदास के राम और हनुमान की साकार साधना के समर्थक होते हुए भी तुलसी रामायण के राम की साकार ही नहीं उन के निर्गुण निराकार स्वरुप को दर्शानेवाले अंशों की विवेचना भी  रामायण के माध्यम से बड़ी सहजता से बोधगम्य बना देते हैं. प्रतिभावान पुरुष किस प्रकार इन विभिन्न मान्यताओं को एक माला के अन्दर विभिन्न मणियों के समान संजो कर रखते हैं आश्चर्य कारक है.
  • वे हमारे समग्र उद्धार के प्रति सजग रहते हुए भी बिना बताये उपकार कर देते हैं हमें पता भी नहीं चलता; और इसको एक सामान्य सी बात के सामान विस्मृत कर देते हैं.
  • गीता में जीवन कैसा जीना चाहिए उसे वे वचनों से नहीं अपने स्वयं के उदाहरण से प्रर्दशित करते आरहे हैं.
  • साधुवाद ; उन्हें जो उनके संपर्क में आकर उनके साथ लव मात्र भी सत्संग पा सका है.

मनीषियों की उदारता


मनीषियों की उदारता
दिनांक १२.११.०९ के दैनिक भास्कर में प. वि. श. मेहता ने ध्यान की गंभीरता को एक सूफी संत के जीवन की एक घटना के  माध्यम से व्यक्त किये हैं! ध्यान  में  अनुभूति के गंभीर पलों में शांति की स्थिति में  स्वावलोकन से प्राप्त निष्कर्ष के बहुमूल्य मोतियों को जनसामान्य में बिखेरने या जन सामान्य के रसास्वादन हितार्थ परोसना  उदारता का परिचायक होता है.

ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के लिए वैसी शांति पाना ही सनातन धर्मं के अनुयायियों का प्रथम एवं एकमात्र ध्येय होना चाहिए जो मानव जन्म को सार्थकता प्रदान कर सके. भौतिकता से परे सत्यान्वेषण के मार्ग का अनुसरण करने का मौलिक अधिकार पाना भारत भूमि पर जन्म पाने के सौभाग्य का द्योतक है. जो निश्चय ही  ब्रह्म्वेद्ग्यता की ओर ले जाता होगा. देश की युवा पीढी अपने मूल को पहचानने के मार्ग पर उद्यत हो ऐसी मशाल आप जलाएं एवं सतत अपने लेखों से समाज को ईर्ष्या, घृणा, मोह, एवं हिंसा से अनिवार्यतः मुक्त होने की प्रेरणा देने के लिए मनीषी लेखकों की  लेखनी से सदा होता रहे जब तक हमारे दिग्भ्रमित देशबंधु जाग्रत न हो जाएँ. पुनः स्वामी विवेकानंद जैसी वाणी,एवं लेखनी से  जाग्रति फैलाने का अवसर आ गया है. समाज की  तात्कालिक परिस्तिथियों में भ्रमितों को मार्गदर्शन प्रदान करने की आवश्यकता सदैव बनी रहती है ! समाज का अध्ययन कर शाश्वत सत्य का मार्ग दिखाने का कार्य विश्लेष्णात्मक बुद्धि सम्पन्न मनीषी साहित्यको का ही होता है.
दैनिक भास्कर को भी साधुवाद है जो प्रेरणादायक लेखो को स्थान देता है पुनः पुनः साधुवाद 
  ओम प्रकाश श्रीवास्तव

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गुरुवार, 12 नवंबर 2009

मानव जन्म की मौलिक आवाश्यकता

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मानव जन्म की मौलिक आवाश्यकता
ॐ नमों भगवते वासुदेवाय
 साधना से एक दिन सब पाया जा सकता है. वैदिक युग में समाधि में लीन ऋषि गण भौतिक जगत् के बारे में भी वे सभी जानकारियां पा जाते थे जो आज विज्ञानं विभिन्न gadgets का उपयोग कर पाने का प्रयास कर रही है.
आप विदेश में रहकर भी अपने संस्कारों के कारण विश्व के एक मात्र धर्मं ' स्व की खोज'  के प्रति जागरूक  रह सकते हैं  दुःख का विषय तो यह है कि   भौतिकता की झूटी चमक दमक एवं इंद्रिय सुखों की तलाश में भटकता हुआ पश्चिम का अनुकरण कर भारत का  मानव भी अपने जन्म के हेतु को विस्मृत कर रहा है. भारत के शिक्षित वर्ग को भी अपने सनातन कर्तव्य का स्मरण कराने एवं  उस की राह दिखाने वाले अत्यंत अल्प मात्र में विद्यमान हैं!
मानव जीवन की समाप्ति के पूर्व प्राचीन महर्षि अकल्पनीय ऊंचाइयों को पा लेते थे तो आज भी क्यों नहीं संभव है ;यह प्रश्न विचारणीय है. आज भी जिज्ञासु के लिए गुरु उपस्थित है तथा अहेतुकि कृपा वृष्टि करने के लिए तत्पर हैं. किन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के पश्चात् भी आवश्यक अभ्यास न होने से वांछित उपलब्धि नहीं मिल पाती.
कृपा प्राप्त जिज्ञासु के द्वारा पर्याप्त प्रयास न कर पाने एवं जिज्ञासुओं की संख्या में कमी आने का कारण भी स्पष्ट लक्ष्य है. आज पश्चिमी प्रभाव की सभी वर्गों में व्याप्ति होने के कारण भौतिक उपलब्धियों और वासनाओ में भी वृद्धि हो चुकी है. आज संपन्न व्यक्ति को  समाज में ज्ञानी एवं  विरागी की अपेक्षा अधिक सम्मान प्राप्त होता है.
विषम परिस्थितियों की विद्यमानता के उपरांत भी अपने जन्म की मौलिक आबश्यकता के  प्रति चेतना बनाये रखना ही हमारा कर्तव्य है फिर ईश्वर किसी न किसी रूप हमें उस मार्ग जाने के लिए किसी न किसी प्रकार से अवसर निर्माण अवश्य करते हैं